नक्शा त्रुटि सुधार का केस खारिज क्यों होता है
सभी पाठकों को नमस्कार
Introduction:-
आज का लेख आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण होने वाला है क्योंकि इस लेख में हम आपको बताएंगे की यदि नक्शा त्रुटि सुधार का प्रकरण है तो उसने पड़ोसी कृषकों की सुनवाई की जाना क्यों जरूरी है और यदि उनकी सुनवाई नहीं की जाती है तो ऐसी स्थिति में प्रकरण के क्या परिणाम हो सकते हैं तो आइए आज के लेख को शुरू करते हैं आज का लेख राजस्व मंडल के एक प्रकरण से संबंधित है जिसमें राजस्व मंडल के समक्ष एक निगरानी प्रस्तुत हुई थी और उस निगरानी में माननीय राजस्व मंडल के द्वारा क्या आदेश पारित किया गया था उसके संबंध में आज हम इस लेख में चर्चा करने वाले हैं।
गुमान सिंह विरुद्ध गणेश राम आदि
प्रकरण क्रमांक 06 / निगरानी / 2004-05
आदेश दिनाँक 06-11-2009
यह निगरानी अपर आयुक्त, भोपाल / होशंगाबाद संभाग, भोपाल के प्रकरण क्रमांक 06 / निग. / 2004 2005 में पारित आदेश दिनांक 16.5.2005 के विरुद्ध म. प्र. भू-राजस्व संहिता, 1959 (जिसे संक्षेप में केवल संहिता कहा जायेगा) की धारा 50 के तहत प्रस्तुत की गई थी।
निगराकार की ओर से अधिवक्ता द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि प्रकरण में कलेक्टर के समक्ष धारा 107 संहिता के अंतर्गत नक्शा दुरूस्ती के प्रकरण में उनके द्वारा 24.6.03 को आपत्ति प्रस्तुत की गई थी। उक्त आपत्ति में उनके द्वारा यह उल्लेख किया गया कि खसरा क्रमांक 8 में रकबा 5.008 हैक्टर है। जिसमें आवेदक के नाम खसरा नं. 8 मिन. रकबा 3.742 हेक्टर है और उसके भतीजे लालू के नाम 1.265 हैक्टर भूमि है। प्रकरण में लालू को पक्षकार बनाने का अनुरोध तथा सीमांकन का अनुरोध किया गया था। उनके द्वारा अपनी आपत्ति में यह भी उल्लेख किया गया कि उसके एवं उसके भतीजे लालू द्वारा विवादित सर्वे नं. 8 के रकबा 3.742 हेक्टर एवं 1.265 हैक्टर की नप्ती के लिए विधिवत चालान प्रस्तुत किया गया है परंतु सीमांकन नहीं किया गया है। उक्त दोनों आपत्तियों का निराकरण किए जाने के संबंध में उनके द्वारा यह सहमति दी गई थी कि आराजी क्रमांक 8 के रकबा में 0.810 हैक्टर अधिक बताई गई है, जबकि प्रार्थी उस पर रकबे काबिज है। जिस दिशा में एस एल आर ने अधिक बताई है उसमें प्रार्थी के करीब 50 पेड़ फलदार और कुंआ बना है, यदि उनके पेड़ों को छोड़कर भूमि निकाली जाती है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी।
उनके द्वारा यह तर्क दिया गया कि निगरानीकर्ता को पक्षकार नहीं बनाया गया है किंतु उनकी आपत्ति को सुना गया। खसरा क्रमांक 8 के अंग के अभिलिखित भूमिस्वामी लालू को पक्षकार नहीं बनाया गया। इस संबंध में उनके द्वारा यह आपत्ति ली गई कि जब खसरा क्रमांक 8 से भूमि कम किया जाना है तो खसरा क्रमांक 8 की भूमि का सीमांकन किया जाना आवश्यक था तथा भूमि के अभिलिखित भूमिस्वामी लालू को सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए था जो कलेक्टर न्यायालय द्वारा नहीं किया है। अपर आयुक्त द्वारा उक्त वैधानिक त्रुटि की और ध्यान न देकर कलेक्टर न्यायालय के आदेश को स्थिर रखकर वैधानिक त्रुटि की है।
अनावेदक के अधिवक्ता द्वारा इस संबंध में कलेक्टर के आदेश का उल्लेख किया गया, जिसमें आपत्तिकर्ता की आपत्ति का निराकरण का उल्लेख किया गया। उनके द्वारा यह तर्क दिया गया कि अपर आयुक्त द्वारा प्रस्तुत निगरानी का विधिसम्यक निराकरण किया गया है।
राजस्व मण्डल के द्वारा प्रकरण में उभयपक्षकारों के तर्कों पर मनन किया एवं अधीनस्थ न्यायालयों के अभिलेखों का परिशीलन किया गया। प्रकरण में अनावेदक क्रमांक 1 की भूमि खसरा क्रमांक 16 रकबा 0.607 हैक्टेयर है। प्रकरण में यह स्पष्ट है कि खसरा कमांक 16 में खसरा क्रमांक 8 से रकबा कम किए जाने का आदेश कलेक्टर द्वारा दिया गया है। अभिलेख से स्पष्ट होता है कि कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत प्रकरण में खसरा क्रमांक 8 के अभिलिखित भूमिस्वामी आवेदक को पक्षकार नहीं बनाया गया और ना उक्त भूमि के अंश पर हित रखने वाले लालू को उक्त दोनों को कलेक्टर द्वारा सूचनापत्र जारी नहीं किये गये हैं एवं सुनवाई का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया है। एस एल आर के प्रतिवेदन से यह स्पष्ट है कि प्रकरण में खसरा क्रमांक 16 में कम भूमि 0.405 हैक्टर की पूर्ति खसरा क्रमांक 8 की भूमि में से कम की जाकर किया जाना प्रस्तावित किया गया है। ऐसी स्थिति में खसरा क्रमांक 8 के भूमिस्वामियों को सुना जाना कलेक्टर न्यायालय के लिए वैधानिक रूप से आवश्यक था, किंतु प्रकरण में उनके द्वारा उन्हें विधिवत नहीं सुना गया है। प्रकरण में यह भी महत्वपूर्ण है कि खसरा क्रमांक 8 का रकबा 5.008 हैक्टर बताया गया है जबकि नक्शे में भूमि 5.818 हैक्टर बताई गई है, किंतु आवेदन का कब्जा 5.008 हैक्टर पर बताया गया है। इस संबंध में आवेदक का यह तर्क महत्व रखता है जो भूमि कब्जे में है उतनी भूमि ही मौके पर है और उनके द्वारा अधिक भूमि पर कब्जा नहीं किया गया है। ऐसी स्थिति में खसरा क्रमांक 16 का नक्शा दुरस्त किए जाने के पूर्व खसरा क्रमांक 8 का सीमांकन किया जाना वैधानिक रूप से आवश्यक है, जबकि प्रकरण में निगरानीकार द्वारा विधिवत आवेदन प्रस्तुत किए जाने के उपरांत भी कार्यवाही नहीं की गई है।
प्रकरण में उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट है कि खसरा क्रमांक 8 के अभिलिखित भूमिस्वामियों एवं लालू का संहिता की धारा 107 की कार्यवाही में नहीं सुना गया है जबकि उनकी भूमि में से रकबा कम किए जाने के आदेश दिए गए हैं। प्रकरण में खसरा क्रमांक 8 के सीमांकन के आवेदन पत्र पर भी विचार नहीं किया गया है। जबकि प्रकरण के विधिसम्यक तथा नियमानुकूल निराकरण के लिए खसरा क्रमांक 6 का सीमांकन किया जाना चाहिए था।
उपरोक्त विवेचना के आधार पर राजस्व मण्डल ने अपर आयुक्त एवं कलेक्टर द्वारा पारित आलोच्य आदेश निरस्त करते हुए प्रकरण कलेक्टर न्यायायल को इस निर्देश के साथ प्रत्यावर्तित किया कि प्रकरण में खसरा क्रमांक 8 के अभिलिखित भूमिस्वामियों को विधिवत अवसर दिया जाये तथा एस एल आर के मौका मुआयना के समय उनकी उपस्थिति उपरांत ही खसरा क्रमांक 8 के सीमांकन को पूर्ण करते हुए विधिवत आदेश गुणदोष के आधार पर उभय पक्षकारों को सुनने के उपरांत पारित करें।
नोट:- उपरोक्त लेख प्रकरण में पारित आदेश का अध्ययन करने के पश्चात लिखा गया है यदि इसमें कोई त्रुटि हो तो इसके लिए लेखक जिम्मेदार नहीं है आप संबंधित न्यायालय का प्रकरण से मिलान कर सकते हैं।

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